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Saadgi

  • book
    Written bySuryakant Gautam
  • Book TitleSaadgi

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ISBN: 978-93-47208-44-7

Publisher: Authors Tree Publishing

Pages: 212

Language: English

MRP: Rs. 249/-

Selling Price: Rs. 225/-

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Category: Poetry

Delivery Time: 6 to 9 working days

About the Book

सादगी केवल एक काव्य-संग्रह नहीं, बल्कि एक संवेदनशील मन की आत्मस्वीकृति, समाज से संवाद और स्वयं से संघर्ष की कहानी है।

यह पुस्तक उन सवालों से जन्म लेती है जो लेखक के मन में बचपन से उठते रहे—समाज की रूढ़ियाँ, धर्म के नाम पर कट्टरता, जातिगत भेदभाव, महिलाओं के प्रति हिंसा, विकलांगता, अन्याय और मनुष्य की संवेदनहीनता।

लेखक सूर्यकांत गौतम स्वयं को एक साधारण इंसान के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो पेशे से वास्तु संरक्षण (Conservation Architecture) से जुड़े हैं, लेकिन भीतर से एक बेचैन कवि हैं।

इस पुस्तक का सबसे मार्मिक पक्ष लेखक का अपने विकलांग बड़े भाई के प्रति प्रेम और पीड़ा है। उनके अनुभव समाज, ईश्वर और भाग्य की अवधारणाओं पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं और पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हैं।

पुस्तक में जाति व्यवस्था, आरक्षण, सामाजिक असमानता और इतिहास पर भी लेखक ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर गहन विचार प्रस्तुत किए हैं।

सादगी का मूल संदेश है—संवेदनशील बने रहना, प्रश्न पूछना और मनुष्य के दुख को समझना।

यह पुस्तक किसी निश्चित उत्तर की तलाश नहीं करती, बल्कि पाठक के भीतर नए प्रश्नों को जन्म देती है। लेखक के शब्दों में, यह उनके आँसुओं, गुस्से, प्रेम और उन तमाम सवालों का संग्रह है जो उन्हें एक कवि बनाते हैं।

About the Author

Suryakant Gautam

मैं, सूर्यकांत गौतम, हाइड्रोजन और कार्बन का एक साधारण-सा संयोजन, प्रजाति: होमो सेपियन्स।

मानव सभ्यता द्वारा निर्मित शिक्षा के पथ पर चलते हुए, मुझे इतिहास की धरोहरों को संजोने का सौभाग्य मिला (A Conservation Architect)। एक कवि के रूप में मैंने स्वयं को खोजा, सुरों की हल्की-सी छाया में मन को बहलाया, और कला के छोटे-छोटे रंगों में अपने अस्तित्व को उकेरता रहा।

निम्न वर्ग में जन्म लेने के कारण, आरक्षण की पहचान से जुड़े एक विद्यार्थी के रूप में, अपनी प्रतिभाओं को समाज के सामने सिद्ध करने की हर दिन एक कोशिश करता रहा हूँ।

उस मानव सभ्यता के मन की लालच और सामाजिक बुराइयों को समझते हुए, मैंने अपने मन को कई बार दुखी और विचलित पाया। अपनी आँखों के आँसुओं को जेब में समेटकर, और मन की चीखों को शब्दों में व्यक्त कर, मैं उन्हें इन पन्नों में दफनाने आया हूँ।

थोड़ा सा पागल... पर आज़ाद,
और फिलहाल, खुश हूँ।
मगर एक बदलाव की उम्मीद में हूँ...

इन्हीं पन्नों पर, अपने अस्तित्व के बिखरे हुए टुकड़ों को समेटते हुए, मैं कुछ पंक्तियाँ सुनाने आया हूँ।

यह किताब मेरी नहीं बल्कि मेरे कुछ गमों के नाम, मेरे कई आँसुओं के नाम... एक अलग सोच के नाम... एक सादगी की उम्मीद के नाम है...।

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