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Vidya Ke Vairagya Se Vidya Ke Anurag Tak

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    Written bySourabh Kumar
  • Book TitleVidya Ke Vairagya Se Vidya Ke Anurag Tak

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ISBN: 978-8169940030

Publisher: Authors Tree Publishing

Pages: 68

Language: Hindi

MRP: Rs. 199/- SAVE Rs.24

Offer Price: Rs. 175/-

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Category: Autobiography

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About the Book

विद्या के वैराग्य से विद्या के अनुराग तक — मैं अभी केवल 24 वर्ष का हूँ और यह मेरी पहली किताब है। यह किसी बड़े लेखक की कल्पना नहीं, बल्कि एक ऐसे युवा की आपबीती है जिसने स्वयं शिक्षा व्यवस्था की कमियों को झेला और पढ़ाई से अनुराग तक का सफर तय किया।

12वीं के बाद मेरा पढ़ाई से पूरी तरह मन उचट गया था। मुझे शिक्षा की वास्तविक शक्ति का एहसास ही नहीं था। लेकिन 2026 में डॉ. बी.आर. अंबेडकर के विचारों और उनकी विद्वत्ता को समझने के बाद मेरी सोच पूरी तरह बदल गई।

किताबों से दूर रहने वाला मैं आज घंटों पढ़ता हूँ और BA-LLB से लेकर PhD तक का लक्ष्य देख रहा हूँ। यह किताब शिक्षा व्यवस्था की कमियों, मेरे बचपन के स्कूल अनुभवों, पढ़ाई से भटकाव, संघर्ष और किताबों से हुए मेरे वैचारिक परिवर्तन की कहानी है।

साथ ही, यह उस सवाल को उठाती है कि हमारी शिक्षा ऐसी क्यों नहीं हो सकती जो बच्चों में पढ़ने की इच्छा और जीवन को बदलने का साहस पैदा करे?

इस किताब के चार भाग हैं—शिक्षा व्यवस्था की वास्तविकता, मेरा बचपन और स्कूल का डर, भटकाव से संघर्ष और किताबों तक का सफर, तथा मेरा नया जन्म और संकल्प।

अगर एक भटका हुआ युवा शिक्षा के प्रति अपना नजरिया बदल सकता है, तो देश का हर बच्चा बदल सकता है। आइए, इस यात्रा में मेरे साथ चलिए—विद्या के वैराग्य से विद्या के अनुराग तक।

“कभी किताबों से दूर भागने वाला एक युवा...
उन्हीं किताबों में अपना नया भविष्य खोज लेता है।”

About the Author

Sourabh Kumar

मैं अभी केवल 24 वर्ष का हूँ और यह मेरी पहली किताब है। यह किसी बड़े लेखक की कल्पना नहीं, बल्कि एक ऐसे युवा की आपबीती है जिसने स्वयं शिक्षा व्यवस्था की कमियों को झेला और पढ़ाई से वैराग्य तक का सफर तय किया।

12वीं के बाद मेरा पढ़ाई से पूरी तरह मन उचट गया था। मुझे शिक्षा की वास्तविक शक्ति का एहसास ही नहीं था। लेकिन 2026 में डॉ. बी.आर. अंबेडकर के विचारों और उनकी विद्वत्ता को समझने के बाद मेरी सोच पूरी तरह बदल गई। किताबों से दूर रहने वाला मैं आज घंटों पढ़ता हूँ और BA-LLB से लेकर PhD तक का लक्ष्य देख रहा हूँ।

यह किताब शिक्षा व्यवस्था की कमियों, मेरे बचपन के स्कूल अनुभवों, पढ़ाई से भटकाव, संघर्ष और किताबों से हुए मेरे वैचारिक परिवर्तन की कहानी है। साथ ही, यह उस सवाल को उठाती है कि हमारी शिक्षा ऐसी क्यों नहीं हो सकती जो बच्चों में पढ़ने की इच्छा और जीवन को बदलने का साहस पैदा करे?

यह किताब चार भागों में विभाजित है—शिक्षा व्यवस्था की वास्तविकता, मेरा बचपन और स्कूल का डर, भटकाव से संघर्ष और किताबों तक का सफर, तथा मेरा नया जन्म और संकल्प।

“अगर एक भटका हुआ युवा शिक्षा के प्रति अपना नजरिया बदल सकता है, तो देश का हर बच्चा बदल सकता है। आइए, इस यात्रा में मेरे साथ चलिए—विद्या के वैराग्य से विद्या के अनुराग तक।”

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